Voyager 1 और Voyager 2: 49 साल पहले पृथ्वी से निकले दो मुसाफिर, जो आज भी अंतरिक्ष में अकेले सफर कर रहे हैं
कल्पना कीजिए कि आपने वर्ष 1977 में अपने घर से किसी मुसाफिर को विदा किया था। उस समय न स्मार्टफोन था, न Google Maps और न आज जैसा इंटरनेट। लगभग आधी सदी बीत गई, दुनिया की कई पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन वह मुसाफिर आज भी सफर कर रहा है—और अरबों किलोमीटर दूर से कभी-कभी अपना संदेश घर भेज देता है।
ये मुसाफिर कोई इंसान नहीं, बल्कि NASA के Voyager 1 और Voyager 2 अंतरिक्ष यान हैं।
आज जब हम कुछ सेकंड के लिए मोबाइल नेटवर्क चले जाने पर परेशान हो जाते हैं, तब यह सोचना ही हैरान करता है कि 1970 के दशक की तकनीक से बने ये spacecraft पृथ्वी से अरबों किलोमीटर दूर रहकर आज भी मानवता की कहानी अंतरिक्ष में लेकर आगे बढ़ रहे हैं।
1977 में शुरू हुआ था यह ऐतिहासिक सफर
NASA ने Voyager 2 को 20 अगस्त 1977 और Voyager 1 को 5 सितंबर 1977 को लॉन्च किया था।
इनका शुरुआती उद्देश्य बाहरी ग्रहों का अध्ययन करना था। Voyager 1 ने Jupiter और Saturn के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां भेजीं, जबकि Voyager 2 ने Jupiter और Saturn के साथ Uranus और Neptune का भी करीब से अध्ययन किया।
Voyager 2 आज तक Uranus और Neptune के पास से गुजरने वाला एकमात्र spacecraft है।
लेकिन ग्रहों की तस्वीरें भेजने के बाद भी इनकी कहानी खत्म नहीं हुई।
दोनों आगे बढ़ते रहे।
सूर्य से दूर... और दूर...
और आखिरकार उस क्षेत्र तक पहुंच गए जिसे हम interstellar space कहते हैं।
एक संदेश भेजिए और जवाब के लिए लगभग दो दिन इंतजार कीजिए
Voyager 1 आज पृथ्वी से इतनी दूर है कि उसका radio signal पृथ्वी तक पहुंचने में 23 घंटे से भी अधिक समय लेता है।
इसे एक सामान्य उदाहरण से समझिए।
मान लीजिए NASA के वैज्ञानिक आज Voyager 1 को संदेश भेजते हैं—
“क्या तुम हमें सुन पा रहे हो?”
उस command को spacecraft तक पहुंचने में लगभग एक दिन लग सकता है।
फिर Voyager जवाब भेजे—
“हां, मैं यहां हूं।”
तो उस जवाब को वापस पृथ्वी तक आने में फिर लगभग उतना ही समय लगेगा।
यानी एक सवाल और उसका जवाब मिलने के बीच करीब दो दिन गुजर सकते हैं।
आज WhatsApp पर दो blue ticks का इंतजार हमें लंबा लगता है। Voyager से बात करने का मतलब है—एक संदेश भेजकर अगले दिन तक इंतजार करना।
इतनी दूर से आने वाला signal कितना कमजोर होगा?
Voyager के transmitter की शक्ति किसी विशाल TV tower जैसी नहीं है। अंतरिक्ष यान बेहद सीमित power पर काम करते हैं।
फिर भी उनसे निकला radio signal अरबों किलोमीटर की यात्रा करके पृथ्वी तक पहुंचता है।
जब वह यहां आता है तो बेहद कमजोर हो चुका होता है। NASA का Deep Space Network अपने विशाल antennas की मदद से ऐसे signals को पकड़ता है।
सोचिए—अंतरिक्ष के लगभग अथाह अंधेरे से आ रही एक बेहद धीमी-सी आवाज...
और पृथ्वी पर बैठे वैज्ञानिक उसे सुनने की कोशिश कर रहे हैं।
वह signal केवल data नहीं है।
वह इस बात का प्रमाण है कि करीब आधी सदी पहले पृथ्वी से भेजी गई हमारी मशीन अभी भी कहीं बहुत दूर मौजूद है।
Voyager के साथ अंतरिक्ष में जा रही है पृथ्वी की कहानी
Voyager 1 और Voyager 2 के साथ एक खास चीज भी भेजी गई थी—Golden Record।
यह सोने की परत चढ़ी हुई phonograph record है, जिसमें पृथ्वी के बारे में जानकारी रखी गई है।
इसमें अलग-अलग भाषाओं में अभिवादन, पृथ्वी की प्राकृतिक आवाजें, संगीत और मानव जीवन तथा हमारे ग्रह को समझाने वाली तस्वीरों से संबंधित जानकारी शामिल की गई।
इसके पीछे विचार बेहद खूबसूरत था।
अगर बहुत दूर भविष्य में किसी दूसरी बुद्धिमान सभ्यता को Voyager मिल जाए, तो शायद उसे पता चल सके कि—
ब्रह्मांड में कभी एक छोटा-सा नीला ग्रह था, जिसका नाम पृथ्वी था... और वहां इंसान रहते थे।
अगर कभी कोई Voyager को ढूंढ ले तो?
इसकी संभावना बेहद कम है। अंतरिक्ष इतना विशाल है कि Voyager का किसी alien civilization तक पहुंच जाना किसी तय destination पर भेजे गए पत्र जैसा नहीं है।
Voyager किसी alien planet की ओर नहीं भेजे गए हैं।
वे बस अपनी trajectories पर आगे बढ़ रहे हैं।
लेकिन यही बात Golden Record को और भावुक बना देती है।
शायद इसे कोई कभी न सुने।
शायद लाखों वर्षों तक कोई इसे न पाए।
फिर भी हमने अपनी आवाज अंतरिक्ष में भेज दी।
जैसे समुद्र में कोई इंसान एक बोतल में अपना संदेश डालकर छोड़ दे—बिना यह जाने कि वह कभी किसी किनारे तक पहुंचेगा भी या नहीं।
Pale Blue Dot: जब पूरी मानवता सिर्फ एक छोटा-सा बिंदु दिखाई दी
1990 में Voyager 1 ने पीछे मुड़कर Solar System की तस्वीरें लीं।
उन्हीं में पृथ्वी की एक तस्वीर भी थी जिसे बाद में “Pale Blue Dot” के नाम से प्रसिद्धि मिली।
उस तस्वीर में हमारी पृथ्वी विशाल ग्रह जैसी नहीं दिखती।
वह लगभग एक छोटे-से प्रकाश बिंदु जैसी दिखाई देती है।
लेकिन उसी छोटे से बिंदु पर हमारा लगभग पूरा ज्ञात मानव इतिहास घटित हुआ।
यहीं हमारे घर हैं।
यहीं हमारी सीमाएं हैं।
यहीं हमारे युद्ध हुए।
यहीं लोगों ने प्रेम किया, परिवार बनाए, सपने देखे और आने वाली पीढ़ियों के लिए दुनिया बनाने की कोशिश की।
अंतरिक्ष की विशालता के सामने हमारी पूरी दुनिया सिर्फ एक छोटा-सा बिंदु है।
Voyager हमेशा हमसे बात नहीं कर पाएंगे
Voyager spacecraft को ऊर्जा Radioisotope Thermoelectric Generators (RTGs) से मिलती है। समय के साथ उपलब्ध electrical power लगातार कम हो रही है।
इसी वजह से mission को अधिक समय तक जीवित रखने के लिए वैज्ञानिकों को instruments और systems की power को बेहद सावधानी से manage करना पड़ता है।
एक समय आएगा जब पृथ्वी Voyager की आवाज सुनना बंद कर देगी।
हम command भेजेंगे...
लेकिन शायद कोई जवाब नहीं आएगा।
यह किसी dramatic explosion की तरह अंत नहीं होगा।
संभवतः बस एक दिन signal नहीं मिलेगा।
और पृथ्वी से हमारी बातचीत समाप्त हो जाएगी।
लेकिन Voyager का सफर खत्म नहीं होगा
Communication बंद होने का मतलब यह नहीं होगा कि Voyager रुक जाएगा।
अंतरिक्ष में उसे रोकने के लिए हवा नहीं है और न किसी सड़क का अंत।
वह आगे बढ़ता रहेगा।
बिना किसी इंसान के।
बिना किसी control room की आवाज के।
बिना यह जाने कि जिस पृथ्वी ने उसे बनाया था, वहां अब क्या हो रहा है।
संभव है कि हजारों, लाखों और उससे भी लंबे समय बाद भी Voyager हमारी Galaxy में यात्रा करता रहे।
उस समय पृथ्वी पर दुनिया कैसी होगी, हम नहीं जानते।
लेकिन Voyager के साथ Golden Record मौजूद रहेगा—मानव सभ्यता की एक छोटी-सी निशानी के रूप में।
Voyager सिर्फ एक spacecraft नहीं, इंसान की जिज्ञासा की कहानी है
Voyager मिशन हमें एक असाधारण बात याद दिलाता है।
हमारा शरीर पृथ्वी से बंधा हुआ हो सकता है, लेकिन हमारी जिज्ञासा नहीं।
1977 में कुछ वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने एक machine बनाई, उसे rocket पर रखा और अंतरिक्ष की ओर भेज दिया।
शायद उनमें से कई लोगों ने कल्पना भी नहीं की होगी कि लगभग 49 साल बाद, वर्ष 2026 में भी दुनिया उस spacecraft के बारे में बात कर रही होगी।
आज Voyager हमसे अरबों किलोमीटर दूर है।
फिर भी उसके अंदर मौजूद Golden Record पर पृथ्वी की आवाजें हैं।
एक तरह से देखें तो Voyager अकेला नहीं है।
वह अपने साथ हम सबकी एक छोटी-सी कहानी लेकर जा रहा है।
और शायद Voyager की सबसे खूबसूरत बात यही है—
एक दिन उसकी आवाज हम तक आना बंद हो जाएगी, लेकिन मानवता द्वारा अंतरिक्ष में छोड़ा गया वह छोटा-सा संदेश तब भी तारों के बीच आगे बढ़ता रहेगा।

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